Thursday, May 27, 2021

हाइकु, दस्तूर

5-7-5 वर्ण

दुनिया क्रूर

काम क्रोध में चूर

यही दस्तूर।


डॉ. शुचिता अग्रवाल"शुचिसंदीप"

हाइकु, भाव

 विधान- (5-7-5 वर्ण)

पत्थर एक

भाव से माथा टेक

है भगवान।


मन की माला

है जग उजियाला

रहता फेर।


डॉ. शुचिता अग्रवाल"शुचिसंदीप

तिनसुकिया,असम

Wednesday, May 26, 2021

कुण्डलिया, गीता

गीता प्राणी मात्र को,देती है संदेश,

द्वार खुले मन के सभी,जो सुनते उपदेश।

जो सुनते उपदेश,जीव सन्मार्ग समझते,

सांसारिक सुख भोग,सकल पापों से बचते।

समझा जिसने गूढ़,प्रेममय जीवन बिता,

सत चित अरु आनंद,मार्ग दिखलाती गीता।


डॉ.शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"

तिनसुकिया, असम

#दोहे,कर्म

कर्म कंश संहार है,कर्म कृष्ण भगवान।

जैसी जिसकी जीवनी,वैसा ही सम्मान।।


डॉ.शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"

Tuesday, May 25, 2021

कामरूप छन्द, 'माँ की रसोई'

 कामरूप/वैताल छन्द


माँ की रसोई,श्रेष्ठ होई,है न इसका तोड़,

जो भी पकाया,खूब खाया,रोज लगती होड़।

हँसकर बनाती,वो खिलाती,प्रेम से खुश होय,

था स्वाद मीठा,जो पराँठा, माँ खिलाती पोय।


खुशबू निराली,साग वाली,फैलती चहुँ ओर,

मैं पास आती,बैठ जाती,भूख लगती जोर।

छोंकन चिरौंजी,आम लौंजी,माँ बनाती स्वाद,

चाहे दही हो,छाछ ही हो,कुछ न था बेस्वाद।


मैं रूठ जाती,वो मनाती,भोग छप्पन्न लाय,

सीरा कचौरी या पकौड़ी, सोंठ वाली चाय।

चावल पकाई,खीर लाई,तृप्त मन हो जाय,

मुझको खिलाकर,बाँह भरकर,माँ रहे मुस्काय।


चुल्हा जलाती,फूँक छाती,नीर झरते नैन,

लेकिन न थकती,काम करती,और पाती चैन।

स्वादिष्ट खाना,वो जमाना,याद आता आज,

उस सी रसोई,है न कोई,माँ तुम्ही सरताज।

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कामरूप/वैताल छन्द विधान-

यह 26 मात्राओं के चार पदों का सम पद मात्रिक छंद है, दो-दो या चारों पदों पर तुकान्तता रहती है।पदों की यति 9-7-10 पर होती है,यानि प्रत्येक पद में तीन चरण होंगे,पहला चरण 9 मात्राओं का, दूसरा चरण 7 मात्राओं का तथा तीसरा चरण 10 मात्राओं का होगा।

पदांत या तीसरे या आखिरी चरण का अंत गुरु-लघु (2 1) से होता है।

पदों की मात्राओं के आंतरिक विन्यास के अनुसार 

पहले चरण का प्रारम्भ गुरु या लघु-लघु से होना चाहिए।

 दूसरे चरण का प्रारम्भ गुरु-लघु से हो यानि, दूसरे चरण का पहला शब्द या शब्दांश ऐसा त्रिकल बनावे जिसका पहला अक्षर दो मात्राओं का हो।

तीसरे चरण का प्रारम्भिक शब्द भी त्रिकल ही बनाना चाहिए लेकिन इस त्रिकल को लेकर कोई मात्रिक विधान नहीं है. अर्थात, प्रारम्भिक शब्द 21 या 12 हो सकते हैं।

22122,2122,2122 21 (अतिउत्तम)

आंतरिक यति भी समतुकांत हो तो छन्द अधिक मनोहारी बन सकता है लेकिन यह आवश्यक नहीं है।

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शुचिता अग्रवाल,शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम




Sunday, May 23, 2021

#ताँका_जापानीविधा, मन

 दुखता मन

है दुखती आँख सा,

हवा से पीड़ा

व्यंग वाणी बेधती

हृदय क्रीड़ा।


डॉ. शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"

तिनसुकिया, असम

#ताँका_जापानीविधा, मानवता

 5-7-5-7-7


विधान-5-7-5-7-7


ईश्वर सत्ता

प्रत्यक्ष विद्यमान

मन टटोलें

होगा इसका भान

मानवता है नाम


डॉ.शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"

तिनसुकिया, असम


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