Saturday, August 13, 2022

सारस छंद 'जीवन रहस्य'

 सारस छंद 'जीवन रहस्य' 


कार्य असम्भव कुछ भी, है न कभी हो सकता।

ठान रखो निज मन में, रख प्रतिपल उत्सुकता।।

सोच कभी मत यह लो, मैं हरदम असफल हूँ।

पूर्ण भरोसा यह रख, मैं प्रतिभा, मैं बल हूँ।।


ठेस  कभी लग सकती, लेकिन उठ फिर चलना।

कीच मिले मत घबरा, पंकज बन कर खिलना।।

शौर्य सदा हिय रखना, डरकर तुम मत रुकना।

शीश उठा कर चलना, हार कभी मत झुकना।।


अन्य कभी भी दुख का, कारण हो नहि सकता।

सर्व सुमंगलमय कर, धार रखो नैतिकता।।

धन्य सकल जन होते,  स्वर मधुमय जब बिखरे।

भाव दिखे मुख पर भी, सुंदर आभा निखरे।।


सोच करो निर्णय यह, क्या मिलना है हमको।

ज्योति भरो जीवन में, हर निज मन के तम को।।

भाव रखो उत्तम नित, लक्ष्य भरी आकुलता।

भेद यही शास्वत है, ठान लिया वो मिलता।।


◆◆◆◆◆◆◆

शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Tuesday, July 26, 2022

सारस छंद, 'संकल्प'

 सारस छंद,

 'संकल्प'


नित्य नया काव्य रचूँ, गीत लिखूँ ओज भरे।

प्रेम भरे शब्द सजे, भाव भरा व्योम झरे।।

लक्ष्य नये धार रखूँ, सृष्टि धवल पृष्ठ लगे।

धन्य धरा आज करूँ, स्वच्छ रुचिर भाव जगे।।


भ्रांति त्यजूँ शांति चखूँ, प्रीत जहाँ शांति वहाँ।

बन्धु लगे लोग सभी, दौड़ रही दृष्टि जहाँ।।

देश सकल रूप नवल, एक सबल राष्ट्र बने।

शुद्ध हवा, प्राण दवा, पेड़ लगे सर्व घने।।


ठान लिया मान लिया, स्वार्थ रहित प्रेम करूँ। 

अंध मिटे रूढि छँटे, ज्ञान भरा दीप धरूँ।।

क्लेश मिटे, दर्प छुटे, द्वेष कटे, कष्ट घटे।

चित्त मलिन स्वच्छ करूँ, हृदय छुपा मैल कटे ।।


ज्ञान परम जान लिया, एक अटल सत्य यही।

मृत्यु निकट नित्य बढ़े, बात यही एक सही।।

सीख यही चित्त धरो, सार भरे ग्रंथ पढो।

प्रेम बढा मानव से, कीर्ति सजित मान गढो।।

◆◆◆◆◆◆◆◆


सारस छंद विधान-


सारस छंद 24 मात्रा प्रति पद का सम मात्रिक छंद है।

यह 12 और 12 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहता है। चरणादि गुरु वर्ण तथा विषमकल होना अनिवार्य है। चरणान्त सगण (112) से होता है।

 दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं।


इसका मात्रा विन्यास निम्न है-

2112 2112, 2112 2112


चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है लेकिन इस छंद में 11 को 2 करने की छूट नहीं है।

●●●●●●●●


शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Thursday, June 23, 2022

दिगपाल / मृदुगति छंद, 'पिता'

 दिगपाल / मृदुगति छंद, 

'पिता'


हारा नहीं कभी जो, रुकना न सीख पाया।

संतान को सदा ही, बन वह पिता सजाया।।

वो बीज सृष्टि का है, संसार रचयिता है।

रिश्ते अनेक जग में, लेकिन पिता पिता है।।


अँगुली पकड़ चलाया, काँधे कभी बिठाया।

चलते जिधर गये हम, पाया सदैव साया।।

तकिया बनी भुजाएँ, छाती नरम बिछौना।

घोड़ा कभी बना वो, हँसकर नया खिलौना।।


वो साँझ की प्रतीक्षा, वो ही खिला सवेरा।

उसके बिना न संभव, खुशियों भरा बसेरा।।

उम्मीद पूर्ण दीपक, विश्वास का कवच है।

संबल मिला उसी से, वो स्वप्न एक सच है।।


परिवार की प्रतिष्ठा, तम का करे उजारा।

मोती अलग-अलग हम, धागा पिता हमारा।।

वो नील नभ वही भू, वो सख्त भी नरम है।

संसार के सुखों का, होता पिता चरम है।।


वो है पिता हमें जो, निज लक्ष्य से मिलाता।।

है संविधान घर का, सच राह पर चलाता।

वो शब्द है न कविता, हर ग्रंथ से बड़ा है ।

दुनिया शुरू वहीं से, जिस पथ पिता खड़ा है।।


◆◆◆◆◆◆


दिगपाल छंद / मृदुगति छंद विधान


दिगपाल छंद जो कि मृदुगति छंद के नाम से भी जाना जाता है, 24 मात्रा प्रति पद का सम मात्रिक छंद है।

यह 12 और 12 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहता है।  दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं।


इसका मात्रा विन्यास निम्न है-

2212 122, 2212 122


चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है।

●●●●●●●●


शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Tuesday, June 14, 2022

मदनाग छंद, 'साइकिल

मदनाग छंद, 

'साइकिल'


सवारी जो प्रथम हमको मिली, सबसे प्यारी।

गुणों की खान ये है साइकिल, लगती न्यारी।।

बना कर संतुलन अपना सही, इस पर बैठें।

बड़े छोटे चलाते सब इसे, खुद में ऐठें।।


सुलभ व्यायाम करवाती चले, आलस हरती।

न फैलाती प्रदूषण साइकिल, फुर्ती भरती।।

खुला आकाश, ठंडी सी हवा, पैडल मारो।

गिरो भी तो उठो आगे बढो, कुछ ना धारो।।


भगाती दूर रोगों को कई, दुख हर लेती।

बढ़ाकर रक्त के संचार को, सेहत देती।।

इसी से आत्मनिर्भरता बढ़े, बढ़ते जाओ।

नवल सोपान पर उन्मुक्त हो, चढ़ते जाओ।।


बजा घंटी हटाओ भीड़ को, राह बनाओ।

बना कर लक्ष्य जीवन में बढो, सीख सिखाओ।।

न घबरा कर कभी भी भीड़ से, थमो न राही।

सवारी साइकिल की कर बनो, 'शुचि' उत्साही।।

●●●●●●●●●

मदनाग छंद विधान-

मदनाग छंद 25 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है जो 17-8 मात्राओं के दो यति खण्ड में विभक्त रहता है।

इसका मात्रा विन्यास निम्न है-


1222 1222 12, 222S = (मदनाग) = 17+8 = 25 मात्रायें।

दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं।

चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है।

अंत में गुरु (2) अनिवार्य है।

◆◆◆◆◆◆◆◆

शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Wednesday, June 8, 2022

सुगीतिका छंद, 'मेरे लाल'

 सुगीतिका छंद,

 'मेरे लाल'


लिये खड़ी शुभकामना का, मैं सजाकर थाल।

घड़ी-घड़ी आशीष दूँ यह, तू जिये सौ साल।।

निहाल हूँ पाकर तुम्हे मैं, इस जनम में लाल।

न आँच तुम पर आ सकेगी, हूँ तुम्हारी ढाल।।


तुम्हे बधाई जन्मदिन की, स्वप्न हो साकार।

मिले तुम्हें ऐश्वर्य, खुशियाँ, प्रेम का उपहार।।

नवीन ऊर्जा, स्वस्थ काया, सूर्य सा हो तेज।

सदैव फूलों सी महकती, हो तुम्हारी सेज।।


जड़ें प्रतिष्ठा की बढ़े पर, हो नियत अति नेक।

हृदय सुसेवा, शौर्य जागे, सुप्त हो अविवेक।।

उमंग नित परमार्थ की हो, प्रेरणा हो पास।

भरा रखो हर क्षेत्र में तुम, कार्य का उल्लास।।


रहे बरसती प्रभु कृपा नित, शुद्ध हो आचार।

भरा रहे भंडार धन का, लक्ष्य हो उपकार।।

हँसो हँसाओ प्रेम बाँटो, उच्च यह व्यवहार।

सदा पनपते ही रहे 'शुचि', श्रेष्ठ अति सुविचार।।

◆◆◆◆◆◆◆◆

सुगीतिका छंद विधान-


सुगीतिका छंद 25 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है जो 15-10 मात्राओं के दो यति खण्ड में विभक्त रहता है।

इसका मात्रा विन्यास निम्न है-


1 2122*2, 2122 21 = (सुगीतिका) = 15+10 = 25 मात्रा।


दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं।


चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है।

●●●●●●●●●

शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Wednesday, May 25, 2022

तोटक छंद 'उठ भोर हुई'

तोटक छंद

'उठ भोर हुई'


उठ भोर हुई बगिया महके।

चिड़िया मदमस्त हुई चहके।।

झट आलस त्याग करो अपना।

तब ही सच हो सबका सपना।।


रथ स्वर्णिम सूरज का चमके।

सतरंग धरा पर आ दमके।।

बल, यौवन, स्वस्थ हवा मिलती।

घर-आँगन में खुशियाँ खिलती।।


धरती, गिरि, अम्बर झूम रहे।

बदरा लहरा कर घूम रहे।।

हर दृश्य लगे अति पावन है।

यह भोर बड़ी मनभावन है।


पट मंदिर-मस्जिद के खुलते।

मृदु कोयल के स्वर हैं घुलते।।

तम भाग गया किरणें बिखरी।

नवजीवन पा धरती निखरी।।

◆◆◆◆◆◆◆

तोटक छंद विधान-


तोटक छंद 12 वर्णों की वर्णिक छंद है।

इसमें चार  सगण होते हैं।

112 112 112 112 = 12 वर्ण। 

चार चरण होते है।

दो- दो या चारों चरण समतुकान्त।

●●●●●●●●

शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"

तिनसुकिया, असम

Friday, May 13, 2022

गगनांगना छंद 'आखा तीज'

 गगनांगना छंद 

'आखा तीज'


शुक्ल पक्ष बैसाख मास तिथि, तीज सुहावनी।

नूतन शुभ आरंभ कार्य की, है फल दायनी

आखा तीज नाम से जग में, ये विख्यात है।

स्वयं सिद्ध इसके मुहूर्त को, हर जन ध्यात है।।


त्रेता का आरंभ इसी दिन, हरि युग धर्म का।

अक्षय पात्र मिला पांडव को, था धन कर्म का।।

परशुराम का जन्म हुआ वह, पावन रात थी।

शुरू महाभारत की रचना, शुभ सौगात थी।।


वृंदावन पट श्री विग्रह के, दर्शन को खुले।

कभी सुदामा भी इस दिन ही, हरि से आ मिले।।

भू सरसावन माँ गंगा ने, तिथि थी ये चुनी।

विविध कथाएँ दान-पुण्य के, फल की भी सुनी।।


होते ग्रह अनुकूल सभी ही, हरती आपदा।

धन की वर्षा करती तिथि यह, होता फायदा।।

फल प्रदायिनी मंगलदायक, हिन्दू मान्यता।

मनवांछित शुभ फल है देती, दे आरोग्यता।।

◆◆◆◆◆◆◆

गगनांगना छंद विधान-


गगनांगना छंद 25 मात्राओं का सम मात्रिक छंद है जो 16 और 9 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहता है।  दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं।


इसका मात्रा विन्यास निम्न है-

2222 2222, 2 2212


चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है, किंतु अंत में रगण (212) आवश्यक है।

●●●●●●●●


शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Featured Post

शुद्ध गीता छंद, "गंगा घाट"

 शुद्ध गीता छंद-  "गंगा घाट" घाट गंगा का निहारूँ, देखकर मैं आर पार। पुण्य सलिला, श्वेतवर्णा, जगमगाती स्वच्छ धार।। चमचमाती रेणुका क...