Thursday, March 21, 2024

मणिमध्या छंद 'नैतिक शिक्षा'

 

मणिमध्या छंद

'नैतिक शिक्षा'


जीवन में सत्मार्ग चुनो।

नैतिकता की बात सुनो।।

जो सच राहों पे चलते।

स्वप्न उन्ही के हैं फलते।।


केवल पैसों के बल से।

जीत न पायेंगे छल से।।

स्वार्थ भरी चालें चलना।

है अपने को ही छलना।।


रावण ने सीता हरली।

निष्ठुरता सारी करली।।

अंत बड़ा था कष्ट भरा।

दम्भ मिटा, लंकेश मरा।।


राम जहाँ है जीत वहाँ।

त्याग करो तो मीत वहाँ।।

चाह हमेशा नेक रहे।

धर्म सभी ये बात कहे।।


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मणिमध्या छंद विधान-


मणिमध्या मापनीयुक्त वर्णिक छंद है। इसमें 9 वर्ण होते हैं।

इसका मात्राविन्यास निम्न है-


211 222 112


इस छंद में चार चरण होते हैं। दो-दो या चारों चरण समतुकांत होते हैं।


'भामस प्यारे तीन रखें।

तो मणिमध्या आप चखें'।।

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शुचिता अग्रवाल ' शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Monday, January 8, 2024

हीर छंद "माँ"

 हीर छंद

  "माँ"


माँ प्यारी, जग न्यारी, उजियारी धूप है।

राम वही, श्याम वही, ईश्वर का रूप है।।

चार धाम, अष्ठ याम, अर्चनीय मात है।

शौर्य कथा, नार व्यथा, भोर वही रात है।।


कालजयी, काव्यमयी, मधुरिम वो पद्य है।

गूढ़ भरा, नित्य हरा, सार ग्रन्थ गद्य है।।

आशा है, भाषा है, शब्दों का ज्ञान माँ।

है संस्कृति, संप्रतीति, ब्रह्मा का मान माँ।।


मातृ शक्ति, पूर्ण भक्ति, आस्था का बीज वो।

उत्साही, परिवाही, सावन की तीज वो।।

प्रेममयी, जगन्मयी, रिश्तों की डोर है।

सागर है, गागर है, मध्य वही छोर है।।


तीर वही, धीर वही, ठोस तरल हेम है।

दृष्टि जहाँ, सृष्टि वहाँ, व्याप्त सकल प्रेम है।

मुस्काते, लहराते, आँचल की छाँव में।

व्यस्त रहूँ, मस्त रहूँ, माँ के ही ठाँव में।।


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हीर छंद विधान-


हीर छंद 23 मात्रा प्रति पद की सम मात्रिक छंद है।

यह 6, 6, 6 5 के तीन यति खंडों में विभक्त रहती है।  दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इस छंद का अन्य नाम हीरक भी है।

अन्तर्यति तुकांतता से रचना का माधुर्य बढ़ जाता है वैसे छंद प्रभाकर के अनुसार इसकी बाध्यता नहीं है।


इसका मात्रा विन्यास निम्न है-

S22, 222, 222 S1S

6 + 6 + 11= 23 मात्राएँ


चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है, किंतु आदि गुरु एवं अंत 212 (रगण) अनिवार्य है।


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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Saturday, December 23, 2023

शार्दूलविक्रीडित छंद 'माँ लक्ष्मी वंदना'

 शार्दूलविक्रीडित छंद

 'माँ लक्ष्मी वंदना'


सारी सृष्टि सदा सुवासित करे, देती तुम्ही भव्यता।

लक्ष्मी हे कमलासना जगत में, तेरी बड़ी दिव्यता।।

पाते वो धन सम्पदा सहज ही, ध्यावे तुम्हे जो सदा।

आकांक्षा मन की सभी फलित हो, जो भक्त पूजे यदा।।


तेरा ही वरदान प्राप्त करके, सम्पन्न होते सभी।

झोली तू भरती सदैव धन से, खाली न होती कभी।।

भक्तों को रखती सदा शरण में, ऐश्वर्य से पालती।

देती वैभव, मान और क्षमता, संताप को टालती।।


हीरे का अति दिव्य ताज सर पे, आभा बड़ी सोहनी।

चाँदी की चुनड़ी चमाक चमके, माँ तू लगे मोहनी।।

सोने की तगड़ी सजी कमर पे, मोती जड़े केश है।

माता तू धनवान एक जग में, मोहे सदा वेश है।।


हे लक्ष्मी हरिवल्लभी नमन है, तेरी करूँ आरती।

तेरा ही गुणगान नित्य करती, मातेश्वरी भारती।।

सेवा, त्याग, परोपकार वर दो, संसार से तार माँ।

श्रद्धा से शुचि भक्ति नित्य करती, नैया करो पार माँ।।

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शार्दूलविक्रीडित छंद विधान-

शार्दूलविक्रीडित छंद चार पदों की वर्णिक छंद है। प्रत्येक पद में 19 वर्ण होते हैं। 12 और 7 वर्णों के बाद यति होती है।

इसका मात्रा विन्यास निम्न है-

222 112 121 112/ 221 221 2

बहुत ही मनोहारी श्लोक जैसे- आदौ राम तपो, या कुन्देन्दु तुषार हार, कस्तूरी तिलकम आदि की रचना इसी छंद में की गई है।

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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Saturday, November 25, 2023

संत छंद 'निश्चय"

 संत छंद

  'निश्चय"


हुई भोर नयी, आओ स्वागत करलें।

चलो साथ बढ़ें, नव ऊर्जा हिय भरलें।।

खिली धूप धवल, कहाँ तिमिर अब गहरा।

रुचिर पुष्प खिले, बाग रहा है लहरा।।


करें कार्य वही, जिससे निज मन सरसे।

बनें निपुण सदा, उत्सुकता हिय बरसे।।

नया जोश जगा, नव राहें हम गढलें।

प्रबल भाव भरें, प्रगति शिखर पर चढ़ लें।।


सदा धैर्य रखें, धार शांति निज मन में।

रहें सदा सजग, ढूँढें गुण हर जन में।।

अटल होय बढ़ें, निडर बनें, हम दमकें।

बढ़े कार्य लगन, शौर्य भाव रख चमकें।।


उच्च भाव रहे, ऊँचे देखें सपने।

अडिग खड़े रहें, हम जीवन में तपने।।

सुगम पंथ चुनें, निश्चय भाव प्रबल हों।

चलो साथ चलें, निष्ठा अजय सबल हों।।


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संत छंद विधान-


संत छंद 21 मात्रा प्रति पद की सम मात्रिक छंद है।

यह 9 और 12 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहती है।  दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं।


इसका मात्रा विन्यास निम्न है-

3 6, 6 6


छक्कल की संभावित संभावनाएं-

(3+3 या 4+2 या 2+4) हो सकते हैं।


चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है, किंतु अंत में  112 (सगण) अनिवार्य है। 

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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Friday, November 24, 2023

मुक्तक, माँ

 "पुण्यतिथि पर अश्रुपूरित श्रद्धांजलि"

कोई प्यारा जब दुनिया को, छोड़ अचानक जाता है।

टीस हृदय में रह रह उठती, याद वही बस आता है।

कैसे भूलूँ उन लम्हों को, साथ बिताये जो हमने,

तुमको खोना हद से ज्यादा, यार मुझे तड़पाता है।।


शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम


मुक्तक, माँ'

 पुण्यतिथि पर अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

माँ तेरी सूरत आँखों से, ओझल हो ना पाती है।

नहीं एक दिन ऐसा जिस दिन, याद न तेरी आती है।

तीन बरस यूँ बीते तुम बिन, जैसे सदियाँ बीत गयी,

मेरी भीगी आँखों को भी, याद तुम्हारी भाती है।।


शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

मुक्तक ' माँ'

 पुण्यतिथि पर अश्रुपूरित श्रद्धांजलि


जब कोई तस्वीर पुरानी, हाथ मेरे लग जाती है।

माँ तेरी सूरत सुंदर सी, हँसकर मुझे लुभाती है।

सुख-दुख का कुछ मिला जुला सा, असर हृदय में जब होता।

चुपके से मेरा मन फिर से, आँचल में तेरे खोता।

मेरे बालों को उँगली से, जैसे तुम सहलाती हो।

सच पूछो तो माँ तुम मुझको, याद बहुत ही आती हो।।


शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

  

मुक्तक 'दोस्त'

 "पुण्यतिथि पर अश्रुपूरित श्रद्धांजलि"

कोई प्यारा जब दुनिया को, छोड़ अचानक जाता है।

टीस हृदय में रह रह उठती, याद वही बस आता है।

कैसे भूलूँ उन लम्हों को, साथ बिताये जो हमने,

तुमको खोना हद से ज्यादा, यार मुझे तड़पाता है।।


शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम


Thursday, November 23, 2023

मुक्तक, माँ

 माँ तेरी सूरत आँखों से, ओझल हो ना पाती है।

नहीं एक दिन ऐसा जिस दिन, याद न तेरी आती है।

तीन बरस यूँ बीते तुम बिन, जैसे सदियाँ बीत गयी,

मेरी भीगी आँखों को भी, याद तुम्हारी भाती है।।

Wednesday, September 27, 2023

त्रिभंगी छंद 'ससुराल'

 त्रिभंगी छंद

 'ससुराल'


ससुराल सजीला, लगे रसीला, छैल-छबीला, यौवन सा।

अति हृदय लुभाता, सहज सुहाता, मन हर्षाता, उपवन सा।।

कोमल भावों का, मृदु छाँवों का, उच्छावों का, डेरा है।

सूरज की गरमी, शीतल नरमी, उत्सवधर्मी, घेरा है।।


मन श्वसुर भाँपते, हृदय झाँकते, घर सँवारते, बड़पन से।

दुख सास मिटाती, हरि गुण गाती, दीप जलाती, शुचि मन से।।

नखराला देवर, मीठा घेवर, तीखा तेवर, दिखलाये।

ननदल हमजोली, हँसी-ठिठोली, मीठी बोली, सिखलाये।।


पिय का घर आना, मन खिल जाना, कुछ उकसाना, सरसाना।

तन रिमझिम सावन, अति मनभावन, मन वृंदावन, बरसाना।।

प्रिय की मृदु बातें, मीठी रातें, सुख सौगातें, व्याकुलता।

नेहर बिसराये, नव घर पाये, सपन सजाये, चंचलता।।


ससुराल प्रेम भी, ठोस-हेम भी, कुशल-क्षेम भी, प्यारा है।

हर भूल भुलाता, गले लगाता, हर्ष जगाता, न्यारा है।।

नित पाठ पढ़ाता, गर्व बढ़ाता, चाव चढाता, घर अपना।

हम इसे सजायें, हिल-मिल जायें, मंगल गायें, हो सपना।।


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त्रिभंगी छंद विधान-


त्रिभंगी प्रति पद 32 मात्राओं का सम पद मात्रिक छंद है। प्रत्येक पद में 10, 8, 8, 6 मात्राओं पर यति होती है। यह 4 पद का छंद है। प्रथम व द्वितीय यति समतुकांत होनी आवश्यक है। परन्तु तीनों यति निभाई जाय तो सर्वश्रेष्ठ है। दो दो चरण समतुकांत होते हैं।


इसकी मात्रा बाँट निम्न प्रकार से है:-

प्रथम यति- 2+4+4

द्वितीय यति- 4+4

तृतीय यति- 4+4

पदान्त यति- 4+2

चौकल में पूरित जगण वर्जित रहता है तथा चौकल की प्रथम मात्रा पर शब्द समाप्त नहीं हो सकता।


पदान्त में एक दीर्घ (S) आवश्यक है लेकिन दो दीर्घ हों तो सौन्दर्य और बढ़ जाता है


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शुचिता अग्रवाल, 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Monday, March 27, 2023

अवतार छंद, 'गोरैया'

 अवतार छंद,

 'गोरैया'

फुर फुर गोरैया उड़े, मदमस्त सी लगे।

चीं चीं चीं का शोर कर, नित भोर वो जगे।।

मृदु गीत सुनाती लहे, वो पवन सी बहे।

तुम दे दो दाना मुझे, वो चहकती कहे।।


चितकबरा तन, पर घने, लघु फुदक सोहती।

अनुपम पतली चोंच से, जन हृदय मोहती।।

छत, नभ, मुँडेर नापती, नव जोश से भरी।

है धैर्य, शौर्य से गढ़ी, बेजोड़ सुंदरी।।


ले आती तृण, कुश उठा, हो निडर भीड़ में।

है कार्यकुशलता भरी, निर्माण नीड़ में।।

मिलजुल कर रहती सदा, व्यवहार की धनी।

घर-आँगन चहका रही, मृदु भाव से सनी।।


सुन मेरी प्यारी सखी, तुम सुखद भोर हो।

निज आँगन समझो इसे, घर यही ठोर हो।।

मैं दाना दूँगी तुम्हें, जल नित्य ही भरूँ।

मत जाना दर से कभी, 'शुचि' विनय नित करूँ।।


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अवतार छंद विधान-


अवतार छंद 23 मात्रा प्रति पद की सम मात्रिक छंद है।

यह 13 और 10 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहती है।  दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं।


इसका मात्रा विन्यास निम्न है-

2 2222 12, 2 3 212 


चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है, किंतु आदि द्विकल एवं अंत 212 (रगण) अनिवार्य है। अठकल के नियम अनुपालनिय है।

Wednesday, March 1, 2023

संपदा छंद 'श्री गणेशाय नमः'

 संपदा छंद

 'श्री गणेशाय नमः'


हे वरगणपति देव, शिव-गौरी सुत सुजान।

श्री कार्तिकेय भ्रात, जगत करे गुण बखान।।

गज मुख दुर्लभ रूप, है काया अति विशाल।

शशि मष्तक पर सोय, अति सुंदर दिव्य भाल।।


तिथि भाद्र शुक्ल चौथ, जन्मे प्रभु श्री गणेश।

है आह्लादित मात, नाचे छम छम महेश।।

तन पीताम्बर सोय, तुण्ड बड़ी है विशाल।

गल मणि माला दिव्य, आकर्षक सौम्य चाल


हो प्रथम पूज्य आप, करें सफल सकल काज।

दुख हरते प्रभु शीघ्र, रखते तुम भक्त लाज।।

हे भूपति विघ्नेश, सब देवों के नरेश।

तन मन धन से भक्त, ध्याते प्रतिपल गणेश।।


हे मेरे आराध्य, नमन करूँ नित विनीत।।

सद्ग्रन्थों को राच, कार्य करूँ मैं पुनीत।

कर लेखन गति तेज, भर दो हिय में उजास।

'शुचि' आँगन में आप, करना प्रभु नित्य वास।।


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संपदा छंद विधान-


संपदा छंद 23 मात्रा प्रति पद की सम मात्रिक छंद है।

यह 11 और 12 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहती है।  दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं।


इसका मात्रा विन्यास निम्न है-

2 22221, 2222 121


चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है, किंतु आदि द्विकल एवं अंत 121 (जगण) अनिवार्य है। अठकल के नियम अनुपालनिय है।

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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Sunday, November 20, 2022

निश्चल छंद, 'ऋतु शीत'

 निश्चल छंद,

 'ऋतु शीत'


श्वेत अश्व पर चढ़कर आई, फिर ऋतु शीत।

स्वागत करने नवल भोर का, आये मीत।।

गिरि शिखरों पर धवल ओढ़नी, दृश्य पुनीत।

पवन प्रवाहित होकर गाये, मधुरिम गीत।।


शिशिर आगमन पर रिमझिम सी, है बरसात।

अगुवाई कर स्वच्छ करे ज्यूँ, वसुधा गात।।

प्रेम प्रदर्शित करती मिहिका, किसलय चूम।।

पुष्प नवेले ऋतु अभिवादन, करते झूम।


रजत वृष्टि सम हिम कण बरसे, है सुखसार।

ग्रीष्म विदाई करके नाचे, सब नर-नार।।

दिखे काँच सम ताल सरोवर, अनुपम रूप।

उस पर हीरक की छवि देती, उजली धूप।।


होता है आतिथ्य चार दिन, फिर है रोष।

शरद सुंदरी में दिखते हैं, अगणित दोष।।

घिरा कोहरा अविरत ठिठुरन, कम्पित देह।

छूमंतर हो जाता पल में, यह ऋतु नेह।।

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निश्चल छंद विधान-


निश्चल  छंद 23 मात्रा प्रति पद की सम मात्रिक छंद है।

यह 16 और 7 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहती है।  दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं।


इसका मात्रा विन्यास निम्न है-

2222 2222, 22S1


चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है, किंतु अंत गुरु लघु अनिवार्य है।

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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Tuesday, October 18, 2022

लावणी छंद, 'हिन्दी'

  "हिन्दी" 

लावणी छंद


भावों के उपवन में हिन्दी, पुष्प समान सरसती है।

निज परिचय गौरव की द्योतक, रग-रग में जो बसती है।।

सरस, सुबोध, सुकोमल, सुंदर, हिन्दी भाषा होती है।

जग अर्णव भाषाओं का पर, हिन्दी अपनी मोती है।।


प्रथम शब्द रसना पर जो था, वो हिन्दी में तुतलाया।

हँसना, रोना, प्रेम, दया, दुख, हिन्दी में खेला खाया।।

अँग्रेजी में पढ़-पढ़ हारे, समझा हिन्दी में मन ने।

फिर भी जाने क्यूँ हिन्दी को, बिसराया भारत जन ने।।


देश धर्म से नाता तोड़ा, जिसने निज भाषा छोड़ी।

हैं अपराधी भारत माँ के, जिनने मर्यादा तोड़ी।।

है अखंड भारत की शोभा, सबल पुनीत इरादों की।

हिन्दी संवादों की भाषा, मत समझो अनुवादों की।।


ये सद्ग्रन्थों की जननी है, शुचि साहित्य स्त्रोत झरना।

विस्तृत इस भंडार कुंड को, हमको रहते है भरना।।

जो पाश्चात्य दौड़ में दौड़े, दया पात्र समझो उनको।

नहीं नागरिक भारत के वो, गर्व न हिन्दी पर जिनको।।


शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Monday, October 10, 2022

शोभन छंद, 'मंगलास्तुति'

 शोभन छंद,

 'मंगलास्तुति'


सर्व मंगल दायिनी माँ, ज्ञान का अवतार।

शब्द सुमनों का चढ़ाऊँ, नित्य मैं नव हार।।

अवतरण तव शुक्ल पंचम, माघ का शुभ मास।

हे शुभा शुभ शारदे माँ, हिय करो नित वास।।


हस्त सजती पुस्तिका शुभ, पद्म आसन श्वेत।

देवता, ऋषि, मुनि रिझाते, गान कर समवेत।।

कर जोड़ तुझको ध्यावते, मग्न हो नर नार।

वागीश्वरी नित हम करें, जयति जय जयकार।।


आशीष तेरा जब मिले, पनपते सुविचार।

दास चरणों की बनाकर, माँ करो उपकार।।

कलुष हरकर माँ मुझे दो, ज्ञान का वरदान।

भाव वाणी से करूँ मैं, काव्य का रस पान।।


काव्य जीवन में बहे ज्यों, गंग की मृदु धार।

खे रही है नाव इसमें, लेखनी पतवार।।

भाव परहित का रखूं मैं, नित रहे यह भान।

साधना की शक्ति दो माँ, छंद का शुचि ज्ञान।।

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शोभन छंद विधान-


शोभन छंद जो कि सिंहिका छंद के नाम से भी जाना जाता है, 24 मात्रा प्रति पद का सम मात्रिक छंद है।

यह 14 और 10 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहता है।  दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं।


इसका मात्रा विन्यास निम्न है-

5 2 5 2, 212 1121


पँचकल की संभावित संभावनाएं -

122, 212, 221


चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है किंतु इस छंद में 11 को 2 मानने की छूट नहीं है।


अंत में जगण (121) अनिवार्य है।

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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Thursday, October 6, 2022

सुमित्र छंद "मेरा भाई"

 सुमित्र छंद

 "मेरा भाई"


बडी खुशी मुझ को, मिला भाइयों का दुलार।

दिखे अलग सबसे, मेरे भाई शानदार।।

लिये खड़ी बहना, जब राखी का नेह थाल।

निहारते अपलक, बहना को हो कर निहाल।।


सुहावना बचपन, स्मर स्मर अब हों लोटपोट।

किये पढाई हम, साथ पाठ सब घोट घोट।।

हँसे हँसाये तो, मौसम आता है बसन्त।

थमे न ये खुशियाँ, पल हो जाये ये अनन्त।।


बड़ा न वो छोटा, मन से हरदम मालदार।

बढ़े वही आगे, सुनकर बहना की पुकार।।

उसे न देखूँ तो, मन हो जाता है उदास।

वही चमक मेरी, मेरे मन का है उजास।।


खुले गगन जैसा, मन भाई का है विशाल।

बने वही ताकत, वो होता है एक ढाल।।

सभी लगे प्यारे, यूँ तो रिश्ते हैं अनेक।

लगे न घर घर सा, जिस घर भाई हो न एक।।

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सुमित्र छंद विधान-


सुमित्र छंद 24 मात्रा प्रति पद का सम मात्रिक छंद है।

यह 10 और 14 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहता है।  इसका चरणादि एवं चरणान्त जगण (121) से होना अनिवार्य है।

 दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं।


इसका मात्रा विन्यास निम्न है-

121 222, 2222 (अठकल) 2121

10+14=24


चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है।

सुमित्र छंद का अन्य नाम  रसाल छंद भी है।

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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Saturday, August 13, 2022

सारस छंद 'जीवन रहस्य'

 सारस छंद 'जीवन रहस्य' 


कार्य असम्भव कुछ भी, है न कभी हो सकता।

ठान रखो निज मन में, रख प्रतिपल उत्सुकता।।

सोच कभी मत यह लो, मैं हरदम असफल हूँ।

पूर्ण भरोसा यह रख, मैं प्रतिभा, मैं बल हूँ।।


ठेस  कभी लग सकती, लेकिन उठ फिर चलना।

कीच मिले मत घबरा, पंकज बन कर खिलना।।

शौर्य सदा हिय रखना, डरकर तुम मत रुकना।

शीश उठा कर चलना, हार कभी मत झुकना।।


अन्य कभी भी दुख का, कारण हो नहि सकता।

सर्व सुमंगलमय कर, धार रखो नैतिकता।।

धन्य सकल जन होते,  स्वर मधुमय जब बिखरे।

भाव दिखे मुख पर भी, सुंदर आभा निखरे।।


सोच करो निर्णय यह, क्या मिलना है हमको।

ज्योति भरो जीवन में, हर निज मन के तम को।।

भाव रखो उत्तम नित, लक्ष्य भरी आकुलता।

भेद यही शास्वत है, ठान लिया वो मिलता।।


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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Tuesday, July 26, 2022

सारस छंद, 'संकल्प'

 सारस छंद,

 'संकल्प'


नित्य नया काव्य रचूँ, गीत लिखूँ ओज भरे।

प्रेम भरे शब्द सजे, भाव भरा व्योम झरे।।

लक्ष्य नये धार रखूँ, सृष्टि धवल पृष्ठ लगे।

धन्य धरा आज करूँ, स्वच्छ रुचिर भाव जगे।।


भ्रांति त्यजूँ शांति चखूँ, प्रीत जहाँ शांति वहाँ।

बन्धु लगे लोग सभी, दौड़ रही दृष्टि जहाँ।।

देश सकल रूप नवल, एक सबल राष्ट्र बने।

शुद्ध हवा, प्राण दवा, पेड़ लगे सर्व घने।।


ठान लिया मान लिया, स्वार्थ रहित प्रेम करूँ। 

अंध मिटे रूढि छँटे, ज्ञान भरा दीप धरूँ।।

क्लेश मिटे, दर्प छुटे, द्वेष कटे, कष्ट घटे।

चित्त मलिन स्वच्छ करूँ, हृदय छुपा मैल कटे ।।


ज्ञान परम जान लिया, एक अटल सत्य यही।

मृत्यु निकट नित्य बढ़े, बात यही एक सही।।

सीख यही चित्त धरो, सार भरे ग्रंथ पढो।

प्रेम बढा मानव से, कीर्ति सजित मान गढो।।

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सारस छंद विधान-


सारस छंद 24 मात्रा प्रति पद का सम मात्रिक छंद है।

यह 12 और 12 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहता है। चरणादि गुरु वर्ण तथा विषमकल होना अनिवार्य है। चरणान्त सगण (112) से होता है।

 दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं।


इसका मात्रा विन्यास निम्न है-

2112 2112, 2112 2112


चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है लेकिन इस छंद में 11 को 2 करने की छूट नहीं है।

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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Thursday, June 23, 2022

दिगपाल / मृदुगति छंद, 'पिता'

 दिगपाल / मृदुगति छंद, 

'पिता'


हारा नहीं कभी जो, रुकना न सीख पाया।

संतान को सदा ही, बन वह पिता सजाया।।

वो बीज सृष्टि का है, संसार रचयिता है।

रिश्ते अनेक जग में, लेकिन पिता पिता है।।


अँगुली पकड़ चलाया, काँधे कभी बिठाया।

चलते जिधर गये हम, पाया सदैव साया।।

तकिया बनी भुजाएँ, छाती नरम बिछौना।

घोड़ा कभी बना वो, हँसकर नया खिलौना।।


वो साँझ की प्रतीक्षा, वो ही खिला सवेरा।

उसके बिना न संभव, खुशियों भरा बसेरा।।

उम्मीद पूर्ण दीपक, विश्वास का कवच है।

संबल मिला उसी से, वो स्वप्न एक सच है।।


परिवार की प्रतिष्ठा, तम का करे उजारा।

मोती अलग-अलग हम, धागा पिता हमारा।।

वो नील नभ वही भू, वो सख्त भी नरम है।

संसार के सुखों का, होता पिता चरम है।।


वो है पिता हमें जो, निज लक्ष्य से मिलाता।।

है संविधान घर का, सच राह पर चलाता।

वो शब्द है न कविता, हर ग्रंथ से बड़ा है ।

दुनिया शुरू वहीं से, जिस पथ पिता खड़ा है।।


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दिगपाल छंद / मृदुगति छंद विधान


दिगपाल छंद जो कि मृदुगति छंद के नाम से भी जाना जाता है, 24 मात्रा प्रति पद का सम मात्रिक छंद है।

यह 12 और 12 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहता है।  दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं।


इसका मात्रा विन्यास निम्न है-

2212 122, 2212 122


चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है।

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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Tuesday, June 14, 2022

मदनाग छंद, 'साइकिल

मदनाग छंद, 

'साइकिल'


सवारी जो प्रथम हमको मिली, सबसे प्यारी।

गुणों की खान ये है साइकिल, लगती न्यारी।।

बना कर संतुलन अपना सही, इस पर बैठें।

बड़े छोटे चलाते सब इसे, खुद में ऐठें।।


सुलभ व्यायाम करवाती चले, आलस हरती।

न फैलाती प्रदूषण साइकिल, फुर्ती भरती।।

खुला आकाश, ठंडी सी हवा, पैडल मारो।

गिरो भी तो उठो आगे बढो, कुछ ना धारो।।


भगाती दूर रोगों को कई, दुख हर लेती।

बढ़ाकर रक्त के संचार को, सेहत देती।।

इसी से आत्मनिर्भरता बढ़े, बढ़ते जाओ।

नवल सोपान पर उन्मुक्त हो, चढ़ते जाओ।।


बजा घंटी हटाओ भीड़ को, राह बनाओ।

बना कर लक्ष्य जीवन में बढो, सीख सिखाओ।।

न घबरा कर कभी भी भीड़ से, थमो न राही।

सवारी साइकिल की कर बनो, 'शुचि' उत्साही।।

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मदनाग छंद विधान-

मदनाग छंद 25 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है जो 17-8 मात्राओं के दो यति खण्ड में विभक्त रहता है।

इसका मात्रा विन्यास निम्न है-


1222 1222 12, 222S = (मदनाग) = 17+8 = 25 मात्रायें।

दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं।

चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है।

अंत में गुरु (2) अनिवार्य है।

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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

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