वक्त चला यह जायेगा,
बस हिम्मत थोड़ी सी रखलो।
दौर है मुश्किल,साथ निभाना,
मन में प्रण इतना करलो।
कितने हमसे बिछड़ गये,
अब और बिछड़ नहीं पायें बस,
छोड़ो जाति,प्रान्त,भाषा को,
जन हित मुश्किल भी सहलो।
डॉ. शुचिता अग्रवाल"शुचिसंदीप"
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वक्त चला यह जायेगा,
बस हिम्मत थोड़ी सी रखलो।
दौर है मुश्किल,साथ निभाना,
मन में प्रण इतना करलो।
कितने हमसे बिछड़ गये,
अब और बिछड़ नहीं पायें बस,
छोड़ो जाति,प्रान्त,भाषा को,
जन हित मुश्किल भी सहलो।
डॉ. शुचिता अग्रवाल"शुचिसंदीप"
जनक सुता प्रिय जानकी,रामचन्द्र भरतार।
सब कष्टों से है भरा,इनका जीवनसार।।
कष्टों का पर्याय ही,नारी जीवन मान।
क्या निर्धन क्या धनवती,सब खोती अभिमान।।
दया,धैर्य,संयम,क्षमा,नारी गहने चार।
जो धारण करती वही,भवसागर हो पार।।
दिव्य रूप की थी धनी,पतिव्रत धर्म महान।
मात जानकी का करे,सकल जगत गुणगान।।
मात जानकी ने दिया,सबको यह संदेश।
विचलित होना है नहीं,चाहे जो परिवेश।।
डॉ.शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'
तिनसुकिया, असम
(विधान -8-8-8-6 वर्ण)
नेताजी ये बड़े-बड़े,
चुनावों में होते खड़े,
रखते छुपाके राज,
मायावी जाल है।
चेहरे पे चेहरा है,
काम सारा दोहरा है,
पीठ पीछे चोरी वाला,
काला ही माल है।
नशे में है सराबोर,
हिंसा पे भी चले जोर,
बात को दबाने हेतु,
खाखी दलाल है।
आँखे खोलो जगो देश,
बदलो ये परिवेश,
पाँच साल जनता के,
नौचते ये बाल हैं ।
डॉ. शुचिता अग्रवाल,"शुचिसंदीप"
राजनीति की ए बी सी डी नहीं जानती मैं लेकिन,
मोदीजी में रब दिखता है,वो है तो है सब मुमकिन।
जब-जब दुष्ट बढ़े धरती पर,राम जन्म ले आते हैं।
सारे दानव उन्हें भगाने,मिलकर जोर लगाते हैं।
अमित शाह लक्ष्मण से भाई,भरत समान खड़े योगी,
हम हिन्दू वाकिफ है इससे,विजय राम की ही होगी।
डॉ.शुचिता अग्रवाल"शुचिसंदीप"
कुकुभ छंद
"शरत्चंद्र चट्टोपाध्याय"
जब-जब दुष्ट बढ़े धरती पर, सुख कोने में रोता है।
युग उन्नायक कलम हाथ में, लेकर पैदा होता है।।
सन् अट्ठारह सौ छिय्यत्तर, जन्म शरद ने था पाया।
मोतीलाल पिता थे उनके, भुवनमोहिनी ने जाया।।
जब पीड़ा वंचित समाज की, अपने सिर को धुनती थी।
मूक चीख तब नारी मन की, शरद लेखनी सुनती थी।।
जाति-पाँति का भेदभाव भी, विचलित उनको करता था।
सबसे ऊँची मानवता है, मन में भाव उभरता था।।
घोर विरोध समाज किया जब, ग्रंथ 'चरित्र हीन' आया।
बने शिकार ब्रिटिश सत्ता के, जब 'पथेर दावी' छाया।।
ख्याति मिली रच 'निष्कृति', 'शुभदा', 'देवदास' अरु 'परिणीता'।
'चन्द्र नाथ', 'पल्ली समाज' रच, 'दत्ता' से जन-मन जीता।।
पर उपकार किया लेखन से, लेखन पर जीवन वारा।
पुनर्जागरण आंदोलन से, जन-मानस जीवन तारा।।
ऐसे नायक युगों-युगों तक, प्रेरित सबको करते हैं।
धन्य-धन्य ऐसे युग मानव, पर हित में जो मरते हैं।।
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कुकुभ छंद विधान -
कुकुभ छंद सम-मात्रिक छंद है। इस चार पदों के छंद में प्रति पद 30 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक पद 16 और 14 मात्रा के दो चरणों में बंटा हुआ रहता है। विषम चरण 16 मात्राओं का और सम चरण 14 मात्राओं का होता है। दो-दो पद की तुकान्तता का नियम है।
16 मात्रिक वाले चरण का विधान और मात्रा बाँट ठीक चौपाई छंद वाला है। 14 मात्रिक चरण की अंतिम 4 मात्रा सदैव 2 गुरु (SS) होती हैं तथा बची हुई 10 मात्राएँ अठकल + द्विकल होती हैं। । अठकल में दो चौकल या त्रिकल + त्रिकल + द्विकल हो सकता है।
त्रिकल में 21, 12 या 111 तथा
द्विकल में 11 या 2 (दीर्घ) रखा जा सकता है।
चौकल और अठकल के सभी नियम लागू होंगे।
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तिनसुकिया, असम
शुद्ध गीता छंद- "गंगा घाट" घाट गंगा का निहारूँ, देखकर मैं आर पार। पुण्य सलिला, श्वेतवर्णा, जगमगाती स्वच्छ धार।। चमचमाती रेणुका क...