विधान-1-2-3-2-1 शब्द
(1)
कोरोना
चीनी वायरस
युद्ध स्तरीय चाल
विश्व सम्पूर्ण
बेहाल।
डॉ. शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"
तिनसुकिया, असम
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विधान-1-2-3-2-1 शब्द
(1)
कोरोना
चीनी वायरस
युद्ध स्तरीय चाल
विश्व सम्पूर्ण
बेहाल।
डॉ. शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"
तिनसुकिया, असम
सुस्त गगनचर घोर,पेड़ नित काट रहें नर,
विस्मित खग घनघोर,नीड़ बिन हैं सब बेघर।
भूतल गरम अपार,लोह सम लाल हुआ अब,
चिंतित सकल सुजान,प्राकृतिक दोष बढ़े सब।
दूषित जग परिवेश, सृष्टि विषपान करे नित।
दुर्गत वन,सरि, सिंधु,कौन समझे इनका हित,
है क्षति प्रतिदिन आज,भूल करता सब मानव,
वैभव निज सुख स्वार्थ,हेतु बनता वह दानव।
होय विकट खिलवाड़,क्रूर नित स्वांग रचाकर।
केवल क्षणिक प्रमोद,दाँव चलते बस भू पर,
मानव कहर मचाय,छोड़ सत धर्म विरासत
लोलुप मन विकराल,दुष्ट गढ़ता नित आफत।
संकट अति विकराल,होय अब मानव शोषण,
भोग जगत परिणाम,रोग अरु घोर कुपोषण।
क्रूर प्रलय जग माय,प्राण बचने अब मुश्किल,
आज जगत असहाय,जीव दिखते सब धूमिल।
डॉ.शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"
तिनसुकिया, असम
रसाल छन्द विधान-(वार्णिक छन्द)
211 111 121,211 121 1211
चार चरण, दो-दो चरण समतुकांत
कुछ पहले से सुधर गया है,वक्त सुधरता जाय,
अडिग न हो विश्वास ध्यान रख,मत इतना घबराय।
धीरज धर हिम्मत रख ज्यादा,मत कर हाहाकार,
पतझड़ सहकर ही पाते वन,मधुमासी उपचार।
काल-चक्र चलता रहता है,नित आती नव भोर,
अँधियारे को जाना पड़ता,हों चाहे घनघोर।
हमें जीतना ही अब होगा,मत समझो असहाय,
अडिग न हो विश्वास ध्यान रख,मत इतना घबराय।
फिर विकास की होंगी बातें,गायेंगे नवगीत,
हाथ मिलाकर गले लगेंगे,सारे ही मनमीत।
महामारी की उम्र क्षणिक है,जीवन यह अनमोल,
रखो हौंसलों के दरवाजे,प्रतिपल प्यारे खोल।
जंग जीत यह हम जायेंगे, मंगल थाल सजाय,
अडिग न हो विश्वास ध्यान रख,मत इतना घबराय।
डॉ.शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"
तिनसुकिया, असम
सरसी छंद
'हे नाथ'
स्वार्थहीन अनुराग सदा ही, देते हो भगवान।
निज सुख-सुविधा के सब साधन, दिया सदा ही मान।।
करुण कृपा बरसा कर मुझपर, पूरी करते चाह।
इस कठोर जीवन की तुमने, सरल बनायी राह।।
कभी कहाँ संतुष्ट हुई मैं, सदा देखती दोष।
सहज प्राप्त सब होता रहता, फिर भी उठता रोष।।
किया नहीं आभार व्यक्त भी, मैं निर्लज्ज कठोर।
मर्यादा की सीमा लाँघी, पाप किये अति घोर।।
अनदेखा दोषों को करके, देते हो उपहार।
काँटें पाकर भी ले आते, फूलों का नित हार।।
एक पुकार उठे जो मन से, दौड़ पड़े प्रभु आप।
पल में ही फिर सब हर लेते, जीवन के संताप।।
करो कृपा हे नाथ विनय मैं, करती बारम्बार।
श्रद्धा तुझमें बढ़ती जाये, तुम जीवन सुखसार।।
तेरा तुझको सबकुछ अर्पण, नाथ करो कल्याण।, हाथ पकड़ मुझको ले जाना, जब निकलेंगे प्राण।।
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सरसी छंद विधान-
सरसी छंद चार चरणों का सम पद मात्रिक छंद है। जिस में प्रति चरण 27 मात्रायें होती है। 16 और 11 मात्रा पर यति होती है अर्थात प्रथम यति खण्ड 16 मात्रा का तथा द्वितीय यति खण्ड 11 मात्रा का होता है। दो दो चरण समतुकान्त होते हैं।
मात्रा बाँट इस तरह है-
16 मात्रिक पद ठीक चौपाई वाला चरण और 11 मात्रा वाला ठीक दोहा का सम-पद होगा।
छंद के 11 मात्रिक खण्ड की मात्रा बाँट 8+3 (ताल यानी 21) होती है।
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शुचिता अग्रवाल'शुचिसंदीप'
तिनसुकिया, असम
लावणी छंद
"राधा-कृष्ण"
लता, फूल, रज के हर कण में, नभ से झाँक रहे घन में।
राधे-कृष्णा की छवि दिखती, वृन्दावन के निधिवन में।।
राधा-माधव युगल सलोने, निशदिन वहाँ विचरते हैं।
प्रेम सुधा बरसाने भू पर, लीलाएँ नित करते हैं।।
छन-छन पायल की ध्वनि गूँजे, मानो राधा चलती हों।
या बाँहों में प्रिय केशव के, युगल रूप में ढलती हों।।
बनी वल्लरी लिपटी राधा, कृष्ण वृक्ष का रूप धरे।
चाँद सितारे बनकर चादर, निज वल्लभ पर आड़ करे।।
इतराये तितली अलि गूँजे, फूलों का रसपान करे।
कुहक पपीहा बेसुध नाचे, कोयल सुर अति तीव्र भरे।।
कोमल पंखुड़ियाँ खिल उठती, महक उठा मधुवन सारा।
नभ से नव किसलय पर गिरती, ओस बूँद की मृदु धारा।।
जग ज्वालाएं शांत सभी हों, दिव्य धाम वृन्दावन में।
परम प्रेम आनंद बरसता, कृष्ण प्रिया के आँगन में।।
दिव्य युगल के गीत जगत यह, अष्ट याम नित गाता है।
'शुचि' मन निर्मल है तो जग यह, कृष्णमयी बन जाता है।।
शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'
तिनसुकिया, असम
आप यूँ गुमसुम न बैठा करो,
घर पर उदासी छा जाती है।
चिंताओं को साथ न लाया करो,
वो क्या है न कि-
अपने घर की रौनक चली जाती है।
इस गमगीन से माहौल में,
अपनी बिटिया भी सहम सी जाती है।
खुशियों का पिटारा दिन भर जो भरा उसने,
वो क्या है न कि-
डरकर आपको दिखाना ही भूल जाती है।
आपके घर आने से पहले,
माँ-पिताजी भी अपना काम निपटा लेते हैं।
दिनचर्या आपको सुनाने को व्याकुल थे,
लेकिन वो क्या है न कि-
आपको उदास देख चुपचाप सो जाते है़ं।
आपके हँसते चेहरे को देख,
पूरे परिवार को खुशी मिल जाती है।
माना आपने हमारी सब जरूरतें पूरी की,
लेकिन वो क्या है न कि-
आपकी उदासी हमारी खुशियाँ छीन लेती है।
एक अज्ञानी, नासमझ गृहणी ही हूँ मैं,
माना आपके क्षेत्र का ज्ञान नहीं है मुझे।
यूँ तो जिंदगी कट ही रही है हरपल,
लेकिन वो क्या है न कि-
खुश होके जीओ तो बेहतर बन जाती है।
शुचिता अग्रवाल,'शुचिसंदीप'
तिनसुकिया(असम)
क्या कहूँ मेरे हमसफ़र मोबाइल,
तुझमें हर रिश्ते सिमटने लगे।
बच्चे और पति भी अब तो,
तुझमें ही नजर आने लगे।
उठते ही सुबह सबसे पहले,
अपने हाथों में तुम्हें उठाती हूँ।
चार्जर रूपी कप से तुमको,
पहले चाय पिलाती हूँ।
बिगड़ जाये कभी सेहत तुम्हारी,
तो पागल मैं हो जाती हूँ।
सर्विस सेंटर नामक हॉस्पिटल में,
बड़े डॉक्टर को दिखलाती हूँ।
व्हाट्सऐप रूपी दिल की धड़कन,
कैमरा रूपी कोर्निया दिखाती हूँ।
अंग- अंग तेरा सहला -सहला कर,
डॉक्टर से पूरा चेकअप करवाती हूँ।
सोचो तुम्ही न होते तो क्या,
सबसे मैं यूँ जुड़ पाती?
चार दिवारी में रहकर भी क्या,
विश्व भ्रमण मैं कर पाती?
शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"
तिनसुकिया, असम
शुद्ध गीता छंद- "गंगा घाट" घाट गंगा का निहारूँ, देखकर मैं आर पार। पुण्य सलिला, श्वेतवर्णा, जगमगाती स्वच्छ धार।। चमचमाती रेणुका क...