Sunday, November 14, 2021

पद्मावती छंद "दीपोत्सव"

 पद्मावती छंद 

 "दीपोत्सव" 

 

दीपोत्सव बीता, पर्व पुनीता, जो खुशियाँ लेकर आया।

आनंदित मन का, अपनेपन का, उजियारा जग में छाया।।

शुभ मंगलदायक, अति सुखदायक, त्योंहारों के रस न्यारे।

उत्सव ये सारे, बने हमारे, जीवन के गहने प्यारे।।


मन का तम हरती, रोशन करती, रौनक जीवन में लाती।

जगमग दीवाली, दे खुशहाली, धरती को अति सरसाती।।

लक्ष्मी घर आती, चाव चढ़ाती, नव जीवन फिर मिलता है।

आनंद कोष का, नवल जोश का, शुचि प्रसून सा खिलता है।।


मानव चित चंचल, प्रेम दृगंचल, उत्सवधर्मी होता है।

सुख नव नित चाहे, मन लहराये, बीज खुशी के बोता है।।

पल आते रहते, जाते रहते, अद्भुत जग की माया है।

जब दुख जाता है, सुख आता है, धूप बाद ही छाया है।।


दीपक से सीखा, त्याग सरीखा, जीवन पर सुखदायी हो।

सब अंधकार की, दुराचार की, मन से सदा विदायी हो।।

रख हरदम आशा, छोड़ निराशा, पर्वों से हमने जाना।

सुखमय दीवाली, फिर खुशहाली, आएगी हमने माना।।

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पद्मावती छंद विधान-


पद्मावती छंद 32 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है जिसमें क्रमशः 10, 8, 14 मात्रा पर यति आवश्यक है। 

प्रथम दो अंतर्यतियों में समतुकांतता आवश्यक है।

चार चरणों के इस छंद में दो दो या चारों चरण समतुकांत होते हैं।


इसका मात्रा विन्यास निम्न है-

द्विकल + अठकल, अठकल, अठकल + चौकल + दीर्घ वर्ण (S)

2 2222, 2222, 2222 22 S = 10+ 8+ 14 = 32 मात्रा।

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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Wednesday, November 10, 2021

'चुलियाला छंद' "मृदु वाणी"

  'चुलियाला छंद'

   "मृदु वाणी"


शब्दों के व्यवहार का, जिसने सीखा ज्ञान सुखी वह।

वाणी कटुता से भरी, जो बोले है घोर दुखी 

वह।।


होता यदि अन्याय हो, कायर बनकर कष्ट सहो मत।

हँसकर कहना सीखिये, कटु वाणी के शब्द कहो मत।।


औषध करती है भला, होते कड़वे घूँट सहायक।

अंतर्मन निर्मल करे, निंदक होते ज्ञान प्रदायक।।


मृदुवाणी अनमोल है, संचित जो यह कोष करे नर।

सुख ओरों को भी मिले, अनुपम धन से खूब भरे घर।।


कर्कश भाषा क्रोध की, सर्व विनाशक बाण चला मत।

हृदय बेन्ध पर मन करे, पल भर में ही पूर्ण हताहत।।

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चुलियाला छंद विधान -


चुलियाला छंद एक अर्द्धसम मात्रिक छंद है जिसके प्रति पद में 29 मात्रा होती है। प्रत्येक पद 13, 16 मात्रा के दो यति खण्डों में विभाजित रहता है। चुलियाला छंद के दो भेद मिलते हैं। चुलियाला छंद दोहा छंद से विनर्मित होता है। 


प्रथम भेद दोहे के जैसा ही एक द्वि पदी छंद होता है। यह दोहे के अंत में 1211 ये पाँच मात्राएँ जुड़ने से बनता है। इसका मात्रा विन्यास निम्न है -

2222 212, 2222 21 1211 =  (चुलियाला) = 13, 8-21-1211 = 29 मात्रा।


दूसरा भेद चतुष पदी छंद होता है। यह दोहे के अंत में 1SS (यगण) ये पाँच मात्राएं जुड़ने से बनता है। इसके पदांत में सदैव दो दीर्घ वर्ण आते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है -

2222 212, 2222 21 1SS =  (चुलियाला) = 13, 8-21 1+गुरु+गुरु = 29 मात्रा।


उदाहरण-


"मूक पुकारे कोख में, कहती माँ से मोहि बचाओ।

हत्या मेरी रोकलो, लीला माँ तुम आज रचाओ।।

तुम मेरी भगवान हो, जीवन का हो एक सहारा।

हत्यारों के हाथ पर, करो वार तुम एक करारा।।"

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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Tuesday, November 9, 2021

सुमंत छंद "बरसो मेघा"

 सुमंत छंद 

"बरसो मेघा"

      

धरती सारी बाट, देखती हारी।

गर्मी से बेहाल, हुई है भारी।।

उमड़े घन को देख, सभी हरषाये।

ऐसा बरसो चैन, धरा पा जाये।।


वन उपवन भी शुष्क, हुये हैं आओ।

उमड़-घुमड़ कर मेघ, व्योम पर छाओ।।

नदियों का जल वाष्प, बना है सारा।

तुम सूरज का आज, उतारो पारा।।


खलिहानों का सूख, गया है पानी।

खेतों में फिर रंग, चढ़ा दो धानी।।

हरित दुशाला ओढ़, धरा सज जाये।

फूटे अंकुर मेघ, अगर तू आये।।


हे श्यामल घन नीर, धार बरसाओ।

जीवन में उल्लास, नवल भर जाओ।।

व्याकुल वसुधा तृप्त, होय इठलाये।

मधुर सलोने प्रेम, गीत फिर गाये।।

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सुमंत छंद विधान-


सुमंत छंद बीस मात्रा प्रति पद का मात्रिक छंद  है। 

छंद के 11 मात्रिक प्रथम चरण की मात्रा बाँट ठीक दोहे के सम चरण वाली यानी अठकल + ताल (21) है। 

अठकल में 4+4 या  3+3+2 दोनों हो सकते हैं।

9 मात्रिक द्वितीय चरण की मात्रा बाँट 3 + 2 + गुरु गुरु (S S)है। 

त्रिकल में 21, 12, 111 तीनों रूप, द्विकल के 2, 11 दोनों रूप मान्य हैं। 

पदांत में दो गुरु का होना अनिवार्य है।

दो दो पद समतुकांत होने चाहिए।

मात्रा विन्यास-

2222 21, 3 2SS   = (सुमंत) = 11+9 = 20 मात्रा।

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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Tuesday, October 19, 2021

मालिक छंद "राधा रानी"

 मालिक छंद

 "राधा रानी"


चंद्र चाँदनी, मुदित मोहिनी राधा।

बिना तुम्हारे श्याम सदा ही आधा।।

युगल रूप में तुम मोहन की छाया।

एकाकार हुई लगती दो काया।।


वेणु रूप में तुम जब शोभित होती।

श्याम अधर रसपान अमिय में खोती।।

दृश्य अलौकिक रसिक भक्त ये पीते।

भाव भक्ति में सुध बुध खो वे जीते।।


वृंदावन की हो तुम वृंदा रानी।

जहाँ श्याम ने रहने की नित ठानी।। 

सुमन सेज सुखदायक नित बिछ जाती।

निधिवन में जब श्याम सलोनी आती।।


रमा, राधिका, रुकमिण तुम ही सीता।

प्रेम भाव से हरि को हरदम जीता।।

है वृषभानु सुता का वैभव न्यारा।

राधा नाम तुम्हारा शुचि अति प्यारा।।

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मालिक छंद विधान-


मालिक छंद एक सम मात्रिक छंद है, जिसमें प्रति चरण 20 मात्रा रहती हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है-

अठकल + अठकल + गुरु गुरु = 8, 8, 2, 2 = 20 मात्रा।

(अठकल में 4+4 या  3+3+2 दोनों हो सकते हैं।)

चरणान्त गुरु-गुरु(SS) अनिवार्य है।


दो-दो  या चारों चरण समतुकांत होते हैं।


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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम


Saturday, October 16, 2021

योग छंद "विजयादशमी"

 योग छंद 

"विजयादशमी"


अच्छाई जब जीती, हरा बुराई।

जग ने विजया दशमी, तभी मनाई।।

जयकारा गूँजा था, राम लला का।

हुआ अंत धरती से, दुष्ट बला का।।


शक्ति उपासक रावण, महाबली था।

ग्रसित दम्भ से लेकिन, बहुत छली था।

कूटनीति अपनाकर, सिया चुराई।

हर कृत्यों में उसके, छिपी बुराई।।


नहीं धराशायी हो, कभी सुपंथी।

सर्व नाश को पाये, सदा कुपंथी।

चरम फूट पापों का, सदा रहेगा।

कब तक जग रावण के, कलुष सहेगा।।


मानवता की खातिर, शक्ति दिखाएँ।

जग को सत्कर्मों की, भक्ति सिखाएँ।।

राम चरित से जीवन, सफल बनाएँ।

धूम धाम से हम सब, पर्व मनाएँ।।

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योग छंद विधान-


योग छंद एक सम पद मात्रिक छंद है, जिसमें प्रति पद 20 मात्रा रहती हैं। पद 12 और 8 मात्रा के दो  यति खंडों में विभाजित रहता है। 12 मात्रिक प्रथम चरण में चौकल अठकल का कोई भी संभावित क्रम लिया जा सकता है। 

इसकी तीन संभावनाएँ हैं जो तीन चौकल, चौकल + अठकल और अठकल + चौकल 

के रूप में है।


8 मात्रिक दूसरे चरण का विन्यास निम्न 

है -

त्रिकल, लघु, तथा दो दीर्घ वर्ण (SS) = 3+1+4 = 8 

त्रिकल के तीनों (12, 21, 111) रूप मान्य है। 


दो-दो  या चारों पद समतुकांत होते हैं।

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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम

Friday, October 15, 2021

नरहरि छंद "जय माँ दुर्गा"

 नरहरि छंद  

"जय माँ दुर्गा"


जय जग जननी जगदंबा, जय जया।

नव दिन दरबार सजेगा, नित नया।।

शुभ बेला नवरातों की, महकती।

आ पहुँची मैया दर पर, चहकती।।


झन-झन झालर झिलमिल झन, झनकती।

चूड़ी माता की लगती, खनकती।।

माँ सौलह श्रृंगारों से, सज गयी।

घर-घर में शहनाई सी, बज गयी।।


शुचि सकल सरस सुख सागर, सरसते।

घृत, धूप, दीप, फल, मेवा, बरसते।।

चहुँ ओर कृपा दुर्गा की, बढ़ रही।

है शक्ति, भक्ति, श्रद्धा से, तर मही।।


माता मन का तम सारा, तुम हरो।

दुख से उबार जीवन में, सुख भरो।।

मैं मूढ़ न समझी पूजा, विधि कभी।

स्वीकार करो भावों को, तुम सभी।।

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नरहरि छंद विधान-


नरहरि छंद एक सम पद मात्रिक छंद है, जिसमें प्रति पद १९ मात्रा रहती हैं।  १४, ५ मात्रा पर यति का विधान है। दो-दो  या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है-  


१४ मात्रिक चरण की प्रथम दो मात्राएँ सदैव द्विकल के रूप में रहती हैं जिसमें ११ या २ दोनों रूप मान्य हैं। बची हुई १२ मात्रा में चौकल अठकल की निम्न तीन संभावनाओं में से कोई भी प्रयोग में लायी जा सकती है। 

तीन चौकल,

चौकल + अठकल,

अठकल + चौकल

दूसरे चरण की ५ मात्राएँ लघु लघु लघु गुरु(S) रूप में रहती हैं।

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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम


Sunday, October 10, 2021

दिंडी छंद 'सुख सार'

 दिंडी छंद 

'सुख सार'


प्रश्न सदियों से, मन में है आता।

कहाँ असली सुख, मानव है पाता।।

लक्ष्य सबका ही, सुख को है पाना।

जतन जीवन भर, करते सब नाना।।


नियति लेने की, सबकी ही होती।

यहीं खुशियाँ सब, सत्ता हैं खोती।।

स्वयं कारण हम, सुख-दुख का होते।

वही पाते हैं, जो हम हैं बोते।।


लोभ, छल, ममता, मन में है भारी।

सदा मानवता, इनसे ही हारी।।

सहज, दृढ होकर, सद्विचार धारें।

प्रेम भावों से, कटुता को मारें।।


सर्वदा सुखमय, जीवन वो पाते।

खुशी देकर जो, खुशियाँ ले आते।।

प्रेरणा पाकर, हम सब निखरेंगे।

नहीं जीवन में, फिर हम बिखरेंगे।

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दिंडी छंद  विधान-


दिंडी छंद एक सम पद मात्रिक छंद है, जिसमें प्रति पद १९ मात्रा रहती हैं जो ९ और १० मात्रा के दो यति खंडों में विभाजित रहती हैं। दो-दो  या चारों पद समतुकांत होते हैं।


दोनों चरणों की मात्रा बाँट निम्न प्रकार से है।

त्रिकल, द्विकल, चतुष्कल = ३ २ ४ = ९ मात्रा।

छक्कल, दो गुरु वर्ण (SS) = १० मात्रा।

छक्कल में ३ ३, या ४ २ हो सकते हैं।

३ के १११, १२, २१ तीनों रूप मान्य।


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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया, असम



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