Tuesday, November 12, 2019

ग़ज़ल,'जब तक जिओ'

          (बह्र~2122 2122 2122 212)

जब दुखी हों तब भी सबको गुनगुनाना चाहिए
झूम कर दिल के नगाड़े को बजाना चाहिए।

आँसुओं  में ही डुबो कर मारते क्यूँ ख़ुद को हो
जब तलक साँसें चले उड़ कर दिखाना चाहिए।

गर किसी से हो शिकायत मुआफ़ करना सीखलें
भूल कर सारे गिले, दिल में बिठाना चाहिए।

कौन लम्बी उम्र का करता तकाज़ा है यहाँ
ज़िन्दगी का बस मज़ा भरपूर आना चाहिए।

दोष दूजों में न देखें पहले ख़ुद को जांच लें
हो अगर ग़लती हमारी मान लेना चाहिए।

जानते हैं ज़िन्दगी धोका ही देगी जब हमें,
राख के इस ढेर से दिल क्यों लगाना चाहिए-


सुचिता अग्रवाल'सुचिसंदीप'
तिनसुकिया,असम

मुक्त कविता,"हुई फिर देश में हिंसा"


धधकती आग बरसी है सभी डरते नजर आये
हुई फिर देश में हिंसा लहू बहते नजर आये।

अहिंसा के पुजारी जो वही बेमौत मरते हैं
लगी ज्वाला दिलों में अब सभी कहते नजर आये।

इशारों पर भभक उठता शहर सारा वतन देखो
विषैले नाग सत्ता के हमें डसते नजर आये

खिलौने बन गए हैं हम चला व्यापार जोरों से
निलामी बढ़ रही शासक सभी बिकते नजर आये।

बुझी को फिर जलाते औरशोले भी है भड़काते
यही आतँक की शैली सभी रचते नजर आये।।

करे चित्कार मांगे न्याय जो निर्दोष थे बन्दे
बहे आँसू करे फरियाद वो डरते नजर आये।


लगा दो जोर सब अपना बुझादो आग के गोले
गिरो बन गाज दुश्मन पे सभी मरते नजर आये।


सुचिसंदीप, तिनसुकिया

मुक्त कविता,'माँ के उद्गार'


मिला मुझे जो सबसे प्यारा
वो रिश्ता अनमोल तुम्ही बेटी।
नहीं दुनिया में तुमसे बढ़कर
मुझको कोई प्यारा और बेटी।।

जब जब निराशा ने घेरा मुझको
तुम आशा की ज्योति बन जाती हो।
जब जब आँसू बहे हैं मेरे
खुशियों का खजाना बन जाती हो।
तुम राजदार और सलाहकार भी
तुम वफादार सखि हो बेटी
तुमसे जीवन यह जीवन मेरा
जीने की वजह तुम हो बेटी।

तुझमें अपना बचपन देखा
तेरे साथ हर लम्हा जीती हूँ।
तुझसे कहकर हर बात मैं दिल की
सकून बड़ा पा लेती हूँ।
माँ  कितनी खुशकिस्मत हूँ मैं
तुम्हे पाकर जाना यह बेटी
खुशियाँ तुम्हें जहाँ की दे दूँ
चाहत मेरे दिल की है बेटी।।

श्रृंगार किया जब जब तुमने
अपलक तुझे निहारा मैंने।
कहीं नजर न मेरी लग जाये
नजर ये सोच उतारी मैने।
तन सुन्दर मन उससे भी सुन्दर
गुणों की खान तुम हो बेटी
खुशियाँ जो तुमने दी मुझको
हो अनमोल खजाना वो बेटी।।

उपहार भला क्या दूँ तुमको
जो मेरा है सब तेरा है।
मिल जाये तुझे वो सब खुशियाँ
जिन पर अधिकार बस तेरा है।
जन्मोत्सव तेरा बस एक  बहाना
हर पल उत्सव तुम हो बेटी
है आँगन की रौनक बस तुमसे
मेरे आँचल की ममता तुम बेटी।।

सुचिसंदीप

मुक्त कविता,"सीमा पर सैनिक की दास्ताँ"


मुझे सबसे जो प्यारा है वतन भारत वो मेरा है।
मेरे सपनों में बसता है चमकता एक सितारा है।

कहे सैनिक ये सीमा का मुझे जांबाज बनना है,
वतन की गोद में खेला वतन महबूब मेरा है।।

उठाकर आँख जो देखे भड़कता दिल ये मेरा है,
मेरे महबूब की खातिर धड़कता दिल ये मेरा है,
डटा सीमा पे मैं कुर्बान इसकी शान की खातिर,
बने दुश्मन जो इसका है वही दुश्मन भी मेरा है।


कभी जब याद आता है शहर का घर जो मेरा है,
तभी खुश हो के मैं सोचूं वतन सारा ही मेरा है,
रहे नापाक क़दमों से सुरक्षित देश के वासी,
नहीं फिर आँच आएगी वचन पक्का ये मेरा है।।

दिलों में आपके रहलूं यही तो ख्वाब मेरा है,
अमर कुछ काम कर जाऊँ इरादा नेक मेरा है,
खिले इन फूल से बच्चों को ये सन्देश देना तुम,
वतन के प्राण तुम बनना वतन जो आज मेरा है।

        सुचिसंदीप, (शुचिता)अग्रवाल
तिनसुकिया(आसाम)

मुक्त कविता, " पत्नियों के आम सवाल"


मैंने पति को परमेश्वर समझा
उनकी नजर में दासी मैं क्यूँ?
होते हैं गर दो पहिये समान
फिर वो आगे मैं पीछे क्यूँ?
पुरुषत्व की भावना के अभिमानी
नारीत्व का क्यूँ सम्मान नहीं
वो धोंस दिखाते हैं प्रतिपल
है पत्नी इतनी प्रताड़ित क्यूँ?

जिम्मेदारियां मेरी भी कम नहीं
नहीं अहसास उन्हें है क्यूँ?
सर्वोपरी वो मेरी नजर में
तुच्छ मुझे समझते है क्यूँ?
खाना खाकर उठ जाते हैं
जूठे बर्तन तक वो उठाते नहीं
अवकाश मुझे एक दिन नहीं मिलता
उपेक्षित दृष्टि डालते है क्यूँ?

बातों बातों में मायका मेरा
उनकी आँखों में खटकता है क्यूँ?
डरते डरते गिड़गिड़ाते हुए
खर्च मुझे माँगना पड़ता है क्यूँ?
रहती हूँ पूर्ण समर्पित आजीवन
प्रेम को मेरे वो समझते नहीं
प्यार के दो बोल मैं चाहूँ
वो भी बोल नहीं सकते है क्यूँ?

       "सुचिसंदीप"

मुक्त कविता,'"क्रोध घातक आवृति"


बड़ी घातक बिमारी है चलो हम क्रोध को त्यागें,
बढे आकार इसका तो घटे सम्मान हया भागे,
नहीं पहचान रहती है सही हम या गलत बोले,
अड़े रहना ही आदत है बढे नफरत अधी जागे।

धरे संस्कार रह जाते जिसे हमने कमाया है,
गिरे नजरों तले सबके नहीं कुछ हाथ आया है।
बड़ी पीड़ा सताती है हमें जब होश है आता,
करें धिक्कार हाय क्यूँ हमें ये क्रोध आया है।

बढे दूरी दिलों की जब आवाजें तेज आती है,
रुको, सोचो, जरा बैठो दरारें क्यूँ ये आती है,
निकालो शब्द ऐसे ना किसी को जो करे घायल
सभी को प्यार से समझो समझ हर बात आती है।

नहीं वो फैसला अच्छा जिसे हम क्रोध में करते,
वही सीखें हमारे लाल जो व्यवहार हम करते,
करें निदान करें अभ्यास नहीं अब क्रोध करना है,
चलो संकल्प से अपने शुरू यह काम है करते।

नहीं मुश्किल यदि हम सोच को शुचिता बना लेवें,
मधुर व्यवहार से अपने सखा सबको बना लेवें,
नहीं तनकर झुका सकते किसी को याद ये रक्खो,
स्वयं झुककर स्वयं को ही बड़ा सबसे बना लेवें।

सुचिता अग्रवाल," सुचिसंदीप", तिनसुकिया

Saturday, November 9, 2019

राधेश्यामी छन्द,'जब-जब भक्तन से मिलने को'

(16 मात्राएं प्रति चरण)

जब-जब भक्तन से मिलने को,धरती पर अंबे आती है।
खिल जाते मुखड़े भक्तों के,ऐसी खुशियाँ माँ लाती है।

शैलसुता अरु ब्रह्माचारिणी,चन्द्रघण्टा कुष्मांडा हे माँ।
स्कंदरूपिणी कात्यायिनी,हे कालरात्रि स्वरूपा माँ।
हे महागौरी हे सिद्धिदात्री,तू स्वर्ग धरा पर लाती है।
जब-जब भक्तन से मिलने को,धरती पर अंबे आती है।

अँधियारा जग का मिट जाता,नवरातें रोशन होती है।
सब जागे दुर्लभ दर्शन को,मन में जलती एक ज्योति है।
माँ के भजनों में अमृत की,धारा सबको मिल जाती है।
जब-जब भक्तन से मिलने को,धरती पर अंबे आती है।

है आम्रपत्र की वन्दनवारें, हर गाँव नगर गलिहारे पर।
खुश होकर माता देख रही,जब झूमे दुनिया गरवे पर।
मंगलगीतों की धुन पर माँ, भक्तों को खूब नचाती है।
जब-जब भक्तन से मिलने को,धरती पर अंबे आती है।

#स्वरचित#मौलिक
सुचिता अग्रवाल"सुचिसंदीप"
तिनसुकिया, असम
Suchisandeep2010@gmail.com

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