Wednesday, May 12, 2021

हास्य,मोबाइल

क्या कहूँ मेरे हमसफ़र मोबाइल,

तुझमें हर रिश्ते सिमटने लगे।

बच्चे और पति भी अब तो,

तुझमें ही नजर आने लगे।


उठते ही सुबह सबसे पहले,

अपने हाथों में तुम्हें उठाती हूँ।

चार्जर रूपी कप से तुमको,

पहले चाय पिलाती हूँ।


बिगड़ जाये कभी सेहत तुम्हारी,

तो पागल मैं हो जाती हूँ।

सर्विस सेंटर नामक हॉस्पिटल में,

बड़े डॉक्टर को दिखलाती हूँ।


व्हाट्सऐप रूपी दिल की धड़कन,

कैमरा रूपी कोर्निया दिखाती हूँ।

अंग- अंग तेरा सहला -सहला कर,

डॉक्टर से पूरा चेकअप करवाती हूँ।


सोचो तुम्ही न होते तो क्या,

सबसे मैं यूँ जुड़ पाती?

चार दिवारी में रहकर भी क्या,

विश्व भ्रमण मैं कर पाती?


शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"

तिनसुकिया, असम


हास्य,सेल्फी

आगे सेल्फी, पीछे सेल्फी, ऊपर -नीचे दाएँ-बाएँ सेल्फी।

क्या जवान क्या बच्चे भाई, दादी-दादा अब लेते सेल्फी।


स्टूडियो की छुट्टी हो गयी, मोबाइल कैमरा जबसे आया।

खींचने वाले की जरूरत नहीं, सेल्फ डिपेंड का जमाना आया।


बँदरिया सा मुह बनाकर कुछ पाउट पाउट कहती है।

जीभ निकाले फिर आँख चढ़ाकर सेल्फी वो ले लेती है।


बक बक बीवी की नहीं सुननी है, 

सेल्फी का मजा देखो।

पल में गुस्से को छोड़ है देती, बीवी की अब हँसी देखो।


दादाजी की अंतिम साँसे, पर सेल्फी तो एक बनती है।

सैड इमोजी साथ स्टेटस अपलोड फेसबुक पर होती है।


दुर्घटनास्थल पर भी अब तो, डाक्टर से पहले सेल्फी लो।

चँद मिनटों में कमैंट्स और लाइक कितने आये ये गिनलो।


खाना-पीना, मंजन -नहाना और क्या क्या बतलाऊँ।

ये सेल्फी का बुखार दिमाग से कैसे सबका उतरवाऊँ।


नदियों, छतों और ट्रेनों पर भी इतना क्यूँ हो झुक जाते।

सेल्फी लेते लेते अपनी तस्वीर को माला क्यूँ पहना जाते।।


शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया,असम


हास्य,सासु माँ

भरी जवानी मजे उड़ाये,

हर साल महीनों घूम के आये,

थककर यौवन जब सूख गया तो

बहू लाने के सपने सजाये।

रंगीन मिजाज की सासू माँ,  

बहू सीधी सी लाना  चाहे।


पति मेरा सासु के वश में,

श्रवण कुमार घोर कलयुग में,

बन्धन में कैसे रखते पत्नी को,

सीखे सोकर माँ की गोदी में,

भूल गयी सासू माँ मेरी सब,

स्वयं बहू कभी थी इस घर में।


सासु माँ ने कदर न जानी,

बहू को बेटी कभी न मानी,

हर काम में नुक्स निकाला करती,

अपने मन की करने की ठानी,

हर बात की होड़ बहू से करती,

बुढापे में वो करती नादानी।


कब तक घुट कर बहू भी रहती,

अपने दिल की कभी तो सुनती,

पंख फैलाकर उड़ने वो निकली,

सासू  की भौहें क्रोध में टनती,

तानाशाही सत्ता का अंत आ गया,

ये सोच सोच सासू माँ डरती।


पिस गया घुण सा पति बेचारा,

माँ, पत्नी की धौंस का मारा,

कैसे इनकी सुलह कराऊँ,

कुछ सोचके फिर बोला वो प्यारा।

'माँ 'तुम देवी हो इस घर की,

लक्ष्मी सा रूप 'प्रिये' तुम्हारा।


दोनों इक सिक्के के पहलू हो,

बिना एक तुम कुछ भी नहीं हो।

सास , सास तब ही बन पाती,

पराई बिटिया जब बहू बन आती।

इस रिश्ते का सम्मान करो सब,

फिर देखो बहू कैसे बेटी बन जाती।


शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप"

तिनसुकिया,असम


हास्य,पागल प्रेमी नहीं पति होता है।

प्रेमी जब वो हुआ करता था

उसके लक्षण कुछ ऐसे थे।

ज्यूँ प्यासा पानी को तरसे

कुछ सुने हुए से किस्से थे।


घड़ी घड़ी में फोन मिलाता

हर शाम साथ में मुझे घुमाता।

आँखें रस्ता तकती रहती थी, 

बिन माँगे उपहार वो लाता।

प्रेमी सुखद हवा का झोंका था,

स्पर्श से मृदंग बज उठते थे,

अलग अलग हम रहकर भी तब

मानो एक शरीर के हिस्से थे।


एक हुये हम विवाह हुआ,

खुशियाँ भी करवट लेती है।

धीरे धीरे प्रेम की अंधी

पट्टी आँखों से उतरती है।

बात बात पर खींचा तानी

क्रोध के बादल उमड़े थे।

प्रेम सूखकर पिंजर हो गया,

दिल मे चुभते अब शीशे थे।


रात रात अब देर से आना,

कैसी होटल कैसा सिनेमा।

उपहारों की शक्ल को देखे

जैसे बीत गया हो जमाना।

शब्द, परी कली और जानेमन

"पागल औरत" में बदले थे

पागल प्रेमी नहीं पति होता है,

शादी करके ही हम समझे थे।


डॉ. शुचिता अग्रवाल,"शुचिसंदीप"

तिनसुकिया,असम


हास्य,दामादजी

दामादजी तोरण का प्रतिरूप,

कभी हैं छाँव कभी हैं धूप।।


मेरी लाडो के वो सरताज,

करे उसके मन पर वो राज,

उठाये बिटिया के सब नाज,

दबाये पाँव करे सब काज,

दामादजी सपनों का स्वरूप,

कभी हैं छाँव कभी हैं धूप।


सासु माँ देख देख हर्षाये,

पुत्र रूप दामाद में पाये,

न्यौछावर दौलत सारी कर जाये,

निवाला उस घर कभी न खाये,

दामादजी खुशियों का प्रारूप,

कभी हैं छाँव कभी हैं धूप।


पहन के सूट- बूट ये आते,

खुशियाँ लाख साथ में लाते,

छोटी साली को पास बैठाते,

नाच नाच सब इन्हें रिझाते,

दामादजी राजा का है रूप,

कभी हैं छाँव कभी हैं धूप।


अतिथि ये मन को अति भाये,

ब्राह्मण देव भी इनमें समाये,

अकड़ कर पूजा ये करवाये,

टीका, गट, दक्षिणा पाये,

दामादजी न्यौच्छावर कभी कूप,

कभी हैं छाँव कभी हैं धूप।


थोड़ी देर ही बस ये सुहाये,

कहीं नाराज न ये हो जाये,

यही सोच के मन घबराये,

बिदा करके ही चैन सा आये,

दामादजी ठंडाई कभी सूप,

कभी हैं छाँव कभी हैं धूप।


दामादजी तोरण का प्रतिरूप

कभी हैं छाँव कभी हैं धूप।।


डॉ.शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया,असम


Wednesday, May 5, 2021

मदिरा सवैया 'विदाई सीख'

मदिरा सवैया "विदाई सीख"


दामन में खुशियाँ भर के,

पिय आँगन जाय रही बिटिया।


नीर भरी अँखियाँ फिर भी,

मन में हरषाय रही बिटिया।


मंगल चावल दो कुल में,

हँस के बरसाय रही बिटिया।


छोड़ चली घर बाबुल का,

पिय द्वार सजाय रही बिटिया।



मात-पिता सम हैं समधी,

ससुराल लगे घर ही अपना।


काज सभी सुखदायक हों,

महको गुल सी सच हो सपना।


भाव भरा मन स्वच्छ रहे,

प्रभु नाम सदा मन में जपना।


ज्योत सदा हिय प्रेम जले,

शुचि स्नेह भरे तप को तपना।

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मदिरा सवैया विधान -

यह 22 वर्ण प्रति चरण का एक सम वर्ण वृत्त है। अन्य सभी सवैया छंदों की तरह इसकी रचना भी चार चरण में होती है और सभी चारों चरण एक ही तुकांतता के होने आवश्यक हैं।

यह सवैया भगण (211) पर आश्रित है, जिसकी 7 आवृत्ति और अंत में गुरु प्रति चरण में रहता है। इसकी संरचना 211× 7 + 2  है।

(211 211 211 211 211 211 211 2 )

सवैया छंद यति बंधनों में बंधे हुये नहीं होते हैं परंतु कोई चाहे तो लय की सुगमता के लिए इसके चरण में 10 -12 या 12 - 10 वर्ण के 2 यति खंड रख सकता है ।चूंकि यह एक वर्णिक छंद है अतः इसमें गुरु के स्थान पर दो लघु वर्ण का प्रयोग करना अमान्य है।

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शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'

तिनसुकिया,असम


#गीतिका,सुहानी भोर

बह्र-122,21


सुहानी भोर,

छटा चितचोर।


खुला आकाश,

हवा पुरजोर।


विहग मदमस्त,

मचाये शोर।


बुझे पशु प्यास,

नदी का छोर।


कुहक कर दूर,

थिरकता मोर।


चले मनमीत,

भ्रमण की ओर।


प्रभो के हाथ,

जगत की डोर।


#शुचिताअग्रवाल #शुचिसंदीप

#तिनसुकिया

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