Wednesday, November 6, 2019

मुक्त कविता,भारतीय नारी की डायरी के पन्ने"


आज सोमवार है।
जल्दी उठकर सारे काम करने हैं,
बच्चों के मनपसन्द खाने के
टिफिन तैयार करने हैं।
ऑफिस जाने के लिए बेटे के,
कपड़े भी प्रेस करने होंगे,
पति जो रात को बोलकर सोये थे
वो सामान तथा कागज याद से देने होंगे।
किसी की दवाई, मोबाइल या
जरूरत के कागज कहीं छुट न जाये
दौड़ते-दौड़ते बाहर तक पकड़वाकर
अब साँस सी भरने लगी है,
पर साफ-सफाई खाना बनाने से लेकर
बाकी सब काम निपटाने में
कहीं देर न हो जाये।

आज मंगलवार है।
बिटिया को स्कूल में
गिटार देकर भेजना है।
ओह आज उसका स्पोर्ट्स भी है
अतः सफेद जुत्ते पहनाने हैं।
बेटे की पसंद की
चलो आज सब्जी बना लेती हूँ।
याद से आज पति को
मन्दिर जाने को कहती हूँ।
बड़ी बेटी की पढ़ाई पूरी हुई तो क्या
आजकल उसका रात भर जगना
और सुबह लेट से उठना भी तो
हँस-हँस कर सहना है।
खैर.... मैं नहाकर जल्दी से
पूजा तो कर लेती हूँ।
माँ-बाबूजी को नास्ता देने में
कहीं देर न हो जाये।

बुधवार को नास्ते पर
कुछ लोग आने वाले हैं।
पूड़ी-सब्जी और कुछ मीठा
इतनी सी पति की फरमाइश है।
आज लंच में कुछ अच्छा बने
यह बेटी की ख्वाइश है।
यूनीफॉर्म तथा जूते भी धोने की
आज ही गुंजाइश है।
व्यापार काम से पति कल
बाहर जाने वाले हैं।
सूटकेस लगाना भी
मेरे ही हवाले है।
कि बेटी की आवाज आई
मम्मी जल्दी खाना दो,
पिक्चर देखने जाना है,
कहीं देर न हो जाये।

आज बृहस्पतिवार है।
चलो आज कपड़े नहीं धोऊंगी।
कोई बात नहीं उस समय में
अलमारी, राशन वगैरह
ठीक ही कर लेती हूँ।
बच्चों के लिए बाजार से
थोड़ा नास्ता ले आती हूँ।
पर जाने से पहले सासु माँ के
कहे काम पूरे कर देती हूँ
वरना तो खैर....
आज से बिटिया को अच्छी से पढ़ाऊँगी,
उसका अधूरा प्रोजेक्ट भी करवाऊँगी।
अब जल्दी तैयार होती हूँ वरना
कहीं देर न हो जाये।

आज शुक्रवार है।
खाना बन चुका,
अब आयरन लगा लेती हूँ।
सब कमरों में चद्दर भी
आज ही बदल देती हूँ।
रात को पार्टी में जाने से पहले
घर पर खाना जल्दी से बना लेती हूँ।
आने में देर हो जाएगी तो
दही भी अभी ही जमा देती हूँ।
अलार्म जरूर लगाना होगा
सुबह नींद खुलने में
कहीं देर न हो जाये।

शनिवार कितनी जल्दी आ गया।
कैसे पूरा सप्ताह निकल गया।
बस आज केवल बिटिया को
कोचिंग से मुझे लाना होगा।
रविवार को यह तो आराम होगा।
जूस के लिए फ्रूट्स भी मंगवाने है
हिसाब दिखाकर पैसे भी अब लेने हैं।
रिस्तेदारों की शिकायत है कि
मैं फोन नहीं करती हूँ।
चलो आज हाल पूछ लेती हूँ,
कम से कम रिश्ते निभाने में
कहीं देर न हो जाये।

फिर से आज रविवार है।
अतः थोड़ी ज्यादा व्यस्त हूँ।
बच्चों की फरमाइश पर
खुश होकर बहुत कुछ करना है।
वरना कहेंगे कि-
एक ही दिन तो हमें छुट्टी मिलती है
और उस दिन भी आप हमारे लिये
कुछ भी नहीं करती।
आखिर मैं भी तो एक भारतीय नारी हूँ
जो माँ, पत्नी और बहू बनकर
काम करते कभी नहीं थकती।

डॉ.सुचिता अग्रवाल"सुचिसंदीप"
तिनसुकिया, असम

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